Film Review Kaagaz

0
572

कई लोगो के लिए कागज़ बहुत कमज़ोर वस्तु हो सकती है जो एक झटके में फट सकता है| लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इस कागज़ पर कुछ लिख दिया जाए तो वो पत्थर की लकीर बन जाता है फिर चाहे लिखा हुआ गलत ही क्यों न हो|

किसी कागज़ की क्या अहमियत या औकात हो सकती है उसे सतीश कौशिक ने अपने निर्देशन के जरिये फिल्म कागज़ में दिखने की कोशिश की है|

कहानी (Story)

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव का निवासी निवासी भरत लाल (पंकज त्रिपाठी) खुद का एक छोटा सा बैंड चलाता है| वह अपनी पत्नी (मोनाल गज्जर) और बच्चे के साथ सुख से रह रहा है| रुख्मिणी उसे अपने सपनो को बड़ा करने के लिए कर्ज़ा लेने का सुझाव देती है| लेकिन भरत लाल को पता चलता है की l

भरत लाल जब बैंक में क़र्ज़ लेने जाता है तो बैंक उसे सिक्योरिटी के लिए उसे ज़मीन इत्यादि के कागज़ गिरवी रखने के लिए कहता है तभी लोन मिल सकता है| भरत अपनी ज़मीन के कागज़ निकलवाने के लिए लेखपाल के पास जाता है और लेखपाल बताता है की भरत कागज़ो में मर चुका है| भरत को ये भी पता चलता है की उसे कागज़ो में मारने वाले और कोई नहीं उसकी के चाचा और उनके परिवार के सदस्य है| भरत को मरा हुआ बता कर उसके हिस्से की ज़मीन की ज़मीन उसके चाचा ने ज़मीन अपने बच्चों के नाम कर दी है|

भरत लाल अब सचमुच में तो ज़िंदा है लेकिन रिकॉर्ड में वो मर चुका है| गाँव के लोग भी उसका मज़ाक उड़ाते है| भरत के लिए एक कागज ने ऐसी दुविधा पैदा कर दी है कि उन्हें अब जिंदा होते हुए भी अपने जीवित होने का सबूत माँगना पद रहा है|

बस इतना बोलते ही भरत लाल के सारे सपने टूट जाते हैं क्योंकि जमीन मिलना तो दूर उन्हें तो अपनी जिंदगी का वो सच पता चल जाता है जिसकी वजह से 18 साल लंबी एक जंग की तैयानी करनी पड़ती है|

इसके बाद शुरू होता है भरत लाल का लंबा संघर्ष जिसमें वह नीचे के अधिकारी से लेकर प्रधानमंत्री तक को पत्र लिखते है और जगह से उन्हें आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता| ऐसा लगता मानो लेखपाल की पदवी प्रधामंत्री से भी बड़ी है|

अंततः भरत लाल की मुलाकात होती है वकील साधुराम केवट (सतीश कौशिक) जो शुरुआत में तो उन्हें बकरा समझ के हलाल करने की सोचते है लेकिन भरत के जुझारूपन के चलते अंत तक उसकी मदद करने के लिए खड़े रहते है|

लेकिन इसी बीच भरत खुद को जीवित साबित करने के चक्कर में अपना काम धाम छोड़ बैठता है और इस कारण अपनी पत्नी को भी खुद के खिलाफ खड़ा कर लेता है| लेकिन भरत किसी भी हालत में हार नहीं मानता और 18 साल के लंबे संघर्ष के बाद भरत लाल आख़िरकार कैसे कागजों में खुद को जीवित करता है यही कहानी है फिल्म कागज़ की।

Film Review Kaagaz

Film Review Kaagaz by Bollywood Product

रिव्यु (Film Review – Kaagaz)

फिल्म कागज़, भारत देश की कार्यपालिका और कानून वयवस्था की कड़वी सच्चाई को व्यक्त करता है। देशभर के गांव-देहातों में आज भी भरत लाल जैसे जिंदा मरे हुए लोग घूम रहे हैं और अपनी पूरी जिंदगी खुद को जीवित साबित करने में लगा रहे है| कुछ तो ऐसे भी लोग है जो खुद को जीवित साबित करने की कोशिश में सचमुच स्वर्गवासी हो जाते है|

फिल्म न्याय व्यवस्था पर भी कटाक्ष करती है जिसे जीवित व्यक्ति के सामने होने के बावजूद भी उसके ज़िंदा होने का सबूत चाहिए|

कागज़ की शुरुआत बहुत हलके-फुल्के अंदाज़ में होती है| लेकिन कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है; गंभीर होती जाती है| डायरेक्टर सतीश कौशिक ने खुद की लिखी कहानी में खुद के लिए भी एक किरदार तय किया और वो उसमे बिलकुल फिट बैठते है|

पंकज त्रिपाठी को इस फिल्म के लिए चुनना शायद इस फिल्म का सबसे प्लस पॉइंट है| भरत का किरदार पंकज कुछ इस तरह अदा करते है मानो वो सचमुच भरत की ज़िन्दगी जी रहें हो| अगर इस फिल्म से पंकज को निकल दिया जाये तो यकीन मानिये फिल्म में कुछ नहीं रह जाता है| भरत लाल के दर्द को पंकज त्रिपाठी ने बखूबी समझा और इस फिल्म में बड़ी ही खूबसूरती से निभाया है और अपने अभिनय के मुकाम को एक नयी बुलंदी पर पहुंचाया है|

कहानी जैसे-जैसे जैसे आगे बढ़ती है भरत लाल के दर्द का एहसास करवाती है| फिल्म कई सन्देश देती है जिसमे पहला है संघर्ष के जज्बे को बनाये रखना| हमें हर मुसीबत में अपने पॉजिटिव ऐटिटूड को बनाये रखना चाहिए|

चूंकि फिल्म सिर्फ एक ही बिंदु पर केंद्रित है इसलिए कहानी में कभी-कभी थोड़ा सा ठहराव महसूस होता है लेकिन खुद को ज़िंदा साबित करने के लिए भरत लाल के अजीबोगरीब हथकंडे कहानी को फिर से आगे ले जाते है।

इसी तरह मोनाल गज्जर एक पत्नी का किरदार बहुत ख़ूबसूरती से निभाती हुई नज़र आती है| एक पत्नी जिसे अपने पति पर विश्वास है और वो हर कदम पर उसका साथ निभाती है| यहाँ तक की अपने पति द्वारा काम-काज छोड़ देने पर वो अपने मामा के घर तो चली आती है लेकिन उसका मकसद भी अपने पति का साथ देना ही होता है|

फिल्म में अमर उपाध्याय को भी एक छोटा सा किरदार दिया गया है जिसमे वह अपनी छाप छोड़ने में कायमाब रहते है| लेकिन जज के रूप में ब्रजेन्द्र काला कमाल का काम करते है|

फिल्म में गीत फिल्म की गति को आगे बढ़ाने का काम भी करते है यहाँ तक की इस सीरियस फिल्म में आइटम डांस भी फिल्म की गति को धीरे नहीं होने देता| इस एकमात्र आइटम सांग में संदीपा धर ने अपने नृत्य की कला बिखेरी है और वो बेहद खूबसूरत नज़र आती है|

सतीश कौशिक के द्वारा लिखी व निर्देशित की गयी कागज़ एक सत्य घटना पर आधारति है जहां पर लाल बिहारी नामक व्यक्ति को 18 साल लग गए थे खुद को ज़िंदा साबित करने में| सतीश कोशिश ने फिल्म को सत्यता के करीब रखने की कोशिश तो की है लेकिन कई बार वो फिल्म को पूरी तरह बांधे रखने में नाकामयाब भी रहते है| फिल्म की लम्बाई लगभग 110 मिनट्स है जिसे करीब 15 मिनट्स और कम किया जा सकता था ताकि फिल्म की गति को सुस्ताने का टाइम ही नहीं मिलता|

क्यों देखे

अगर आप मसाला फिल्मो के शौक़ीन है; अगर आपको सच्ची घटनाएं आकर्षित नहीं करती; यदि आपको बेहतरीन कहानी और अभिनय से कोई लेना-देना नहीं होता तो ये फिल्म आप के लिए बिलकुल नहीं है|

लेकिन मेरा ये मानना है की ये फिल्म हर वर्ग के लिए है| फिल्म में वो सब कुछ है जो आप देखना पसंद करते है| फिल्म में अगर नहीं है तो वो है मसाला, लेकिन उसके बावजूद आप फिल्म को देख सकते है वो भी पूरे परिवार के साथ| हाँ शायद की जगह पर आप फिल्म को फ़ास्ट-फॉरवर्ड करते हुए नज़र आएंगे लेकिन उसके बाद भी ये फिल्म एक बेहतरीन फिल्म है जिसे हर किसी को एक बार देखनी चाहिए| फिल्म में कहानी, अभिनय, देश की कार्यपालिका और न्यायपालिका की सच्चाई और पंकज त्रिपाठी के ऑस्कर विनिंग अभिनय के कारण ये फिल्म देखने को बनती है| साथ ही साथ अगर आप सलमान खान के फैन है तो जान लीजिये की इस फिल्म को प्रोडूस भी सलमान ने ही किया है और साथ ही साथ आपको सलमान खान की आवाज भी फिल्म में सुनने को मिल जाएगी|

रेटिंग (Rating)

IMDB पर इस फिल्म को 7.8 की रेटिंग दी गई है और बॉलीवुड प्रोडक्ट की तरफ से इस फिल्म को 10 में से 8 की रेटिंग दी जा रही है| एक बढ़िया कहानी और पकंज त्रिपाठी के बेहतरीन अभिनय के चलते एक बार इस कागज़ को जरूर देखिये|

Spread the love

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here